महाभारत युद्ध 18 दिन का वृतांत – Mahabharat Yuddh

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महाभारत युद्ध
महाभारत युद्ध – Mahabharat Yuddh

महाभारत का युद्ध कितने दिन चला था

महाभारत इतिहास में अबतक का सबसे बड़ा युद्ध माना जाता है। जिसमें असंख्य लोगों को अपने प्राणों की बलि देनी पड़ी थी। 

महान गणितज्ञ आर्यभट्ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ईसा पूर्व में हुआ 18 दिन के इस युद्ध में प्रत्येक दिन अलग-अलग प्रकार की घटनाएं हुईं, महान योद्धा मृत्यु को प्राप्त हुए, योगेश्वर श्री कृष्ण ने हर प्रकार से धर्म की रक्षा की हर दिन जय और पराजय के उदाहरण प्रस्तुत हुए।

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महाभारत युद्ध का नियम

महाभारत युद्ध आरंभ होने से पहले भीष्म पितामह के सुझाव के परिणाम स्वरूप कौरवों और पांडवो दोनों पक्षों की सहमति से युद्ध के कुछ नियम बनाए गए। 

जो इस प्रकार है, प्रतिदिन युद्ध लड़ने का समय सूर्योदय से सूर्यास्त तक होगा, समान औधे वाले लोग ही आपस में युद्ध कर सकेंगे। 

जैसे रथ वाले रथ वालों से, हाथी सवार अन्य हाथी सवारेसे,और पैदल पैदल से, यदि कोई वीर युद्ध में भयभीत होकर शरण में आए तो उस पर अस्त्र या शस्त्र से प्रहार नहीं किया जाएगा। 

युद्ध में जो भी लोग सेवक की भूमिका में होंगे उनपर किसी भी प्रकार का कोई प्रहार नहीं किया जाएगा। निहत्थे योद्धा पर अस्त्र नहीं उठाया जाएगा।  एक वीर के साथ एक से अधिक युद्ध नहीं करेंगे।

मित्रो ! अब हम बात करेंगे महाभारत युद्ध (Mahabharat Yuddh) के 18 दिनों की श्रृंखला की प्रत्येक दिन क्या हुआ, और किस पक्ष को क्या हानि हुई। तो आइए शुरू करते हैं।

1. महाभारत युद्ध का पहला दिन

महाभारत युद्ध का पहला दिन युद्ध आरंभ होने से पहले अर्जुन एवं भगवान कृष्ण का रथ दोनों सेनाओं के मध्य खड़ा था। 

भगवान कृष्ण अर्जुन को गीता का उपदेश देते हैं इसी मध्य भीष्म पितामह घोषणा करते हैं कि युद्ध आरम्भ होने वाला है। 

यदि कोई भी योद्धा दल बदलना चाहें तो वह स्वतंत्र है, यह सुनने के पश्चात धृतराष्ट्र का पुत्र युयुत्सु कौरवों का दल छोड़कर पांडवों की ओर चला गया। 

इसके पश्चात अर्जुन ने अपने देवदत्त नामक शंख से नादकर के युद्ध की घोषणा की।  प्रथम दिन पांडवों को अधिक हानि हुई। 

इस दिन कुल 10,000 सैनिकों की मृत्यु हुई। अभिमन्यु ने भीष्म का धनुष और उनके रथ का ध्वज दंड काट दिया। भीम ने दुशासन पर आक्रमण किया शल्य और भीष्म ने क्रमशः उत्तर और श्वेत का वध किया।  ये दोनों विराट नरेश के पुत्र थे प्रथम दिन की स्थिती देख कौरवों को विश्वास हो गया था कि वो ही विजयी होंगे।

2. महाभारत युद्ध का दूसरा दिन

दूसरे दिन गुरु द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्न, अर्जुन और भीष्म के मध्य युद्ध हुआ। साथ ही कई द्वारा भीष्म के सारथी को घायल किया गया। 

द्रोण ने सात्यकि  का कई बार धनुष तोड़ा और बार बार उसे पराजित किया।  भीष्म ने अर्जुन एवं कृष्ण को घायल किया। 

भीम का युद्ध निषाद और कलिंगों के साथ हुआ और भीम ने हजारों की संख्या में सैनिकों का वध कर दिया।कौरवों के पक्ष में केतुमान कलिंगराज, भानुमान और बहुत से कलिंग वीर योद्धा मारे गए। 

अर्जुन ने भीष्म को नरसंहार करने से रोककर रखा।  और इस प्रकार दूसरे दिन पांडवों के पक्ष में रहा। एवं कौरवों को नुकसान हुआ।

3. महाभारत युद्ध का तीसरा दिन

युद्ध का तीसरा दिन दोनों पक्षों ने सैन्य व्यूह की रचना की। पांडवों की ओर से भीम और अर्जुन ,एवं कौरवों की ओर से दुर्योधन सुरक्षा कर रहे थे। 

तीसरे दिन भीम ने घटोत्कच के साथ मिलकर दुर्योधन की सेना को युद्ध से भगा दिया।  यह देख भीष्म ने भीषण संहार मचा दिया। 

तब भगवान कृष्ण ने अर्जुन से भीष्म का वध करने के लिए कहा।  परन्तु अर्जुन साहस नहीं जुटा पाए, तब भगवान कृष्ण स्वयं ही भीष्म का वध करने के लिए आगे बढ़ते हैं। 

यह देख अर्जुन ने कृष्ण को आश्वासन दिया कि अब वो पूरे साहस के साथ युद्ध करेंगे।  इसके पश्चात अर्जुन ने इस दिन कौरव सेना का भीषण संहार किया। 

जिसमें उन्होंने क्षुद्र, प्राच्य, सौवीर, आदि गुणों को समाप्त कर दिया। भीम ने भी सैकड़ों सैनिकों को मार गिराया और इस दिन भी कौरवों को अधिक हानि हुई।

4. महाभारत युद्ध का चौथा दिन

महाभारत युद्ध चौथे दिन कौरवों ने अर्जुन पर बाणों की वर्षा कर दी। परन्तु अर्जुन ने बाण चलाने वाले सभी सैनिकों को मार गिराया। 

इस दिन भीम ने कौरवों की सेना में भय व्याप्त कर दिया था। दुर्योधन ने भीम का वध करने के लिए अपनी गज सेना को भेजा, परन्तु भीम ने घटोत्कच की सहायता से पूरी गज सेना को समाप्त कर दिया। और चौथा कौरव का वध किया।  इस दिन भीष्म को अर्जुन और भीम ने चुनौती दी।

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5. महाभारत युद्ध का पांचवा दिन

पांचवें दिन भीष्म ने पांडव सेना में हाहाकार मचा दिया। इस दिन दोनों ही पक्षों के सैनिकों का बड़ी संख्या में वध हुआ। 

भीष्म को नियंत्रण में करने के लिए अर्जुन और भीम ने उनके साथ युद्ध किया। सात्यकि ने द्रोण को नियंत्रण में रखा। 

परंतु बाद में भीष्म द्वारा सात्यकि को युद्ध स्थल से भगा दिया गया। इस दिन सात्यकि के 10 पुत्र मृत्यु को प्राप्त हुए।

 

6. महाभारत युद्ध का छठा दिन

छठा दिन दोनों पक्षों ने अपनी अपनी सेनाएं युद्ध क्षेत्र में उतारी।  पांडवों की सेना मगर यू आकार और कौरवों की सेना खरोच यू आकार की थी। 

दोनों सेनाओं में भयंकर युद्ध हुआ,और दुर्योधन अपनी सेना की हानि देखकर बार बार क्रोधित होता रहा।  परन्तु भीष्म उसे समय समय पर समझाते रहे, और इस दिन के अंत में भीष्म ने पांचाल सेना का संहार किया। 

 

7. महाभारत युद्ध का सातवां दिन

सातवें दिन फिर से दोनों पक्षों ने भिन्न भिन्न आकृति में युद्ध क्षेत्र में अपनी सेना एकत्रित की। पांडवों ने वज्र व्यूह  और कौरवों ने मंडलाकार व्यूह की आकृति में सेना व्यवस्थित की।

मंडलाकार में हाथी अनेक रथों के द्वारा रथ अश्वारोहियों के द्वारा अश्वारोही धनुर्धर के द्वारा और धनुर्धर सैनिकों द्वारा सुरक्षित किए गए।  

इस पूरी सेना के बीच में दुर्योधन था, इतनी सुरक्षा और युक्ति  के बाद भी अर्जुन ने कौरवों की सेना में हाहाकार मचा दिया। 

इस दिन धृष्तद्युम  द्वारा दुर्योधन को पराजित किया गया। अर्जुन की दूसरी पत्नी उलूपी के पुत्र इरावान ने विंध्य और अनुविन्द को परास्त किया। नकुल और सहदेव ने शल्य को युद्ध क्षेत्र से भगा दिया। 

दूसरी ओर भगदत्त ने घटोत्कच को युद्ध क्षेत्र से भगाया और भीष्म ने पांडव सेना का भयंकर संहार किया।  इस दिन विराट पुत्र शंख मारा गया जो कौरव सेना के लिए एक बहुत बड़ी हानि थी।

8. महाभारत युद्ध का आठवां दिन

आठवां दिन पांडवों ने तीन शिखर वाले व्यूह  की रचना की और कौरवों द्वारा कछुआ व्यूह की रचना की गई।  इस दिन भीम ने दुर्योधन के आठ भाइयों का वध किया।

वहीं अर्जुन पुत्र इरावान का वध बकासुर पुत्र अम्बलुष के द्वारा किया गया घटोत्कच ने दुर्योधन पर शक्ति का प्रयोग किया ,परन्तु प्रहार के समय ही बंग नरेश मध्य में आ गए और प्रहार स्वयं पर लेकर दुर्योधन के प्राण बचा लिए। और इस प्रकार इस दिन बंग नरेश की मृत्यु हुई। 

शक्ति के प्रहार के कारण दुर्योधन घटोत्कच से भयभीत था, इसके पश्चात भीष्म से आज्ञा लेकर भक्त ने घटोत्कच को पराजित कर भीम समेत अनेक पांडव सैनिकों को पीछे की ओर धकेल दिया।  और आठवें दिन भीम ने  दुर्योधन के नौ अन्य भाइयों का वध किया। 

इस प्रकार एक ही दिन में धृतराष्ट्र के कुल 17 पुत्र मारे गए। इस दिन दोनों ही पक्षों को क्षति पहुंची, परंतु कौरवों को अधिक हानि का सामना करना पड़ा।

 

9. महाभारत युद्ध का नौवां दिन

महाभारत युद्ध का नवाँ दिन महाभारत के नौवें दिन घमासान युद्ध हुआ इस दिन दुर्योधन ने भीष्म से कर्ण को युद्ध में लाने की बात कही।

तब भीष्म ने आश्वासन दिया कि या तो हम किसी पांडव का वध कर देंगे ,या श्रीकृष्ण को शस्त्र उठाने के लिए विवश कर देंगे।

इसके पश्चात भीष्म ने अर्जुन के रथ को खिसकाकर अर्जुन को घायल कर दिया, और अंततः श्री कृष्ण को युद्ध में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा तोड़नी पड़ती है। और कृष्ण अर्जुन के रथ का पहिया उठाकर भीष्म की ओर दौड़ पड़ते हैं।

परंतु कुछ ही क्षणों में वे शांत हो जाते हैं।  इस दिन भीष्म ने पांडवों की सेना का भारी संख्या में वध किया जिसके कारण पांडवों को नौवें दिन बहुत बड़ी हानि का सामना करना पड़ा।

10. महाभारत युद्ध का दसवां दिन

क्योंकि भीष्म ने पांडवों की अधिकांश सेना को समाप्त कर दिया पांडवों की सेना में भय व्याप्त हो गया ,तब भगवान कृष्ण के कहे अनुसार पांडव भीष्म के पास जाकर उनकी मृत्यु का उपाय पूछते हैं।

कुछ देर विचार करने के पश्चात भीष्म ने पांडवों को उपाय बताया।  इसके बाद भीष्म ने मत्स्य और पांचालो का संहार किया। 

पांडव पक्ष ने शिखंडी को भीष्म के साथ युद्ध करने के लिए भेजा शिखंडी को डटा हुआ देखकर भीष्म ने अपने शस्त्र और अस्त्र त्याग दिए।  और अर्जुन ने न चाहते हुए भी भीष्म की देह को बाणों से भेज दिया।

इस प्रकार दसवें दिन भीष्म बाणों की शैया पर लेट गए।  भीष्म को अपने पिता शांतनु से इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। इसलिए उन्होंने उत्तरायण होने पर ही अपनी देह त्यागी।  इस दिन कौरवों ने अपने एक महान योद्धा को खोया। इसलिए कौरव पक्ष को अधिक क्षति हुई।

11. महाभारत युद्ध का ग्यारवां दिन

महाभारत युद्ध का ग्यारहवाँ दिन भीष्म के बाणों की शैया पर लेटने के पश्चात करने के सुझाव के परिणामस्वरूप द्रोण को सेनापति बनाया गया। 

दुर्योधन और शकुनि ने द्रोण से कहा यदि युधिष्ठिर को बंदी बना लिया जाए तो युद्ध उसी क्षण समाप्त हो सकता है। जब दिन के अंत में द्रोण युधिष्ठिर को पराजित करने के पश्चात जैसे ही उन्हें बंदी बनाने के लिए आगे बढ़ते हैं, तब अर्जुन ने बाणों की बौछार करना आरंभ कर दी। और युधिष्ठिर को बचा लिया। 

इस दिन कर्ण ने पांडवो की बड़ी संख्या में सेना का संहार किया, फिर सात्यकि तथा कर्ण, भीम तथा शल्य, सहदेव तथा शकुनि, एवं अर्जुन और सुशर्मा के मध्य युद्ध हुआ। इस दिन पांडवों को अधिक क्षति का सामना करना पड़ा।

12. महाभारत युद्ध का बारवां दिन

ग्यारहवें दिन कौरव युधिष्ठिर को बंदी नहीं बना पाए।  इसलिए अगले दिन कौरवों ने फिर से योजना बनाई। और त्रिगर्त देश के राजा को युधिष्ठिर से बहुत दूर अर्जुन को युद्ध में व्यस्त करने के लिए कहा। 

जिससे अर्जुन की अनुपस्थिति में युधिष्ठिर को आसानी से बंदी बनाया जा सके।  परन्तु अर्जुन समय पर पहुंच गए और उन्होंने फिरसे युधिष्ठिर को बचा लिया।

अर्जुन को दूर ले जाते समय युधिष्ठिर के साथ सात्यकि थे। सात्यकि ने  द्रोण  के  रथ का पहिया काट दिया, और रथ के सभी अश्वो को मार गिराया।

सात्यकि ने कौरव पक्ष के अनेक शक्तिशाली योद्धाओं का वध किया।  जिनमें सुदर्शनम ,मलेच्छो की सेना ,जलसन्धि, त्रिगर्तों की गज सेना, करण का पुत्र प्रसन्न, और सुदर्शन आदि थे। 

भूरिश्रवा ने हर बार सात्यकि को पराजित किया। और हर बार उसे अर्जुन और कृष्ण द्वारा बचाया गया।  इस दिन दोनों ही पक्ष बराबर की टक्कर पर थे। 

13. महाभारत युद्ध का तेरहवाँ दिन

दुर्योधन ने राजा भगदत्त को अर्जुन से युद्ध करने के लिए भेजा भगदत् ने भीम को पराजित किया और इसके पश्चात भक्त और अर्जुन का युद्ध हुआ और इसी बीच भगदत् ने अर्जुन पर वैष्णवास्त्र से प्रहार किया श्रीकृष्ण ने वैष्णवास्त्र को अपने ऊपर लेकर अर्जुन की रक्षा की।

भगदत्त की आयु बहुत अधिक होने के कारण उनके माथे की खाल आंखो तक आती थी। जिससे उन्हें दिखना बंद हो जाता था। 

खाल आँखों पर ना आए इसके लिए भगदत्त माथे पर पट्टी बांधते थे। अर्जुन भगदत्त पर प्रहार कर उनकी आँखों की पट्टी खोल दी।  जिससे भगदड़ को दिखना बंद हो गया और इसी अवसर का फायदा उठाकर अर्जुन ने भगदत्त का वध कर दिया। 

इसी दिन ऐतिहासिक व्यूह चक्रव्यूह की रचना कौरवों द्वारा की गई।  युधिष्ठिर के लिए रचे गए चक्रव्यूह को तोड़ना केवल अभिमन्यु ही जानता था। परंतु चक्रव्यू से निकलना अभिमन्यु को ज्ञात नहीं था। 

अभिमन्यु के साथ  भीम और सभी साथी चक्रव्यूह  के द्वार पर पहुंचे वहा उन सबको जयद्रथ ने रोक लिया। और केवल अभिमन्यु ही प्रवेश कर सका और फिर कर्ण के कहे अनुसार कौरव पक्ष के साथ महान योद्धाओं जयद्रथ, अश्वत्थामा, कर्ण, द्रोण, लक्ष्मण, दुर्योधन, शकुनि, इन सबने मिलकर अभिमन्यु पर आक्रमण किया।

अपने पुत्र अभिमन्यु के वध की सूचना सुन अर्जुन ने सूर्यास्त से पहले जयद्रथ को मारनेकी प्रतिज्ञा लेली। उन्होंने वचन लिया की यदि यह संभव नहीं हो सका तो अर्जुन अग्नि समाधि ले लेंगे।  इस दिन पांडव पक्ष मजबूत रहा परन्तु पांडवो को अभिमन्यु की मृत्यु के कारण एक बहुत बड़ी क्षति का सामना करना पड़ा।

14. महाभारत युद्ध का चौदवा दिन

14 वां दिन अर्जुन की अग्नि समाधि प्रतिज्ञा को सुनकर कौरव बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि वे जानते थे कि जयद्रथ जैसे महान योद्धा को इतने कम समय में पकड़कर उसका वध करना अर्जुन के लिए संभव ही नहीं है।

और साथ ही कौरवों ने निश्चय किया कि जयद्रथ को किसी भी कीमत पर वे बचाकर ही रहेंगे और अर्जुन को अग्नि समाधि लेने के लिए विवश होना पड़ेगा।

द्रोण ने आश्वासन दिया कि वह जयद्रथ को बचा लेंगे और उन्होंने जयद्रथ को सेना के सबसे पिछले भाग में छिपा दिया। चौदवे दिन भूरिश्रवा ने सात्यकि को घेर लिया।

इसके पहले वह सात्यकि के दस पुत्रो का वध कर चुके थे। जैसे ही वह सात्यकि को मारने के लिए आगे पहुंचे ,अर्जुन ने भूरिश्रवा के हाथ काट दिए।

तभी सात्यकि ने उसका सर धड़ से अलग कर दिया। उधर द्रोण ने विराट और द्रुपद दोनों का वध कर दिया।  इसके पश्चात भगवान कृष्ण अपनी माया से सूर्य को ढक लेते हैं। 

जिससे यह प्रतीत हुआ कि सूर्यास्त होने वाला है, तब यह देख अर्जुन अगले समाधि की तैयारी करने लगते हैं, दूसरी ओर छिपा हुआ जयद्रथ अर्जुन की समाधि देखने के लिए अर्जुन का उपहास करते हुए बाहर आता है।

तभी भगवान कृष्ण सूर्य को अनावृत कर देते हैं. और उसी क्षण अर्जुन जयद्रथ को मारकर उसका सिर उसके पिता की गोद में गिरा देते हैं। इस दिन दोनों ही पक्षों को बराबर की क्षति हुई।

15. महाभारत युद्ध का पंदरवा दिन

15 वां दिन गुरु द्रोण और उनके पुत्र अश्वत्थामा ने अपनी विजय लगभग निश्चित ही कर ली थी। पांडवों का पक्ष कमजोर देखकर श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को एक युक्ति बताते हैं, जिसके अंतर्गत अश्वत्थामा के मरने की झूठी सूचना फैला दी थी।

परंतु युधिष्ठिर को असत्य बोलना स्वीकार नहीं था। तब भीम ने अवंती राज्य के हाथी अश्वत्थामा का वध कर दिया। 

इसके पश्चात युद्ध क्षेत्र में बात फैल गई कि अश्वत्थामा मारा गया, परंतु हाथी मारा गया था ,
इसी बीच श्री  कृष्णा ने शंखनाद किया जिससे द्रोणाचार्य को अंत के दो शब्द नहीं सुनाई दिए, उन्होंने केवल इतना ही सुना कि अश्वत्थामा मारा गया, और द्रोण को लगा कि उनका पुत्र मृत्यु को प्राप्त हो गया है। 

यह सुनकर वे शोकाकुल हो उठे और उन्होंने उसी समय शस्त्र त्याग दिए। इसी समय द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न ने तलवार से उनका सिर काट दिया। इस दिन गौरव पक्ष ने अपने सर्वश्रेष्ठ योद्धाओं में से एक को खो दिया इसलिए गौरव को अधिक क्षति पहुंची।

16. महाभारत युद्ध का सोलवा दिन

सोलवा दिन द्रोण का वध होने के बाद कर्ण को सेनापति घोषित किया गया।  कर्ण  पांडव सेना का भयंकर संहार करता है। उसने नकुल और सहदेव को भी पराजित किया। 

परंतु अपनी माँ कुंती को दिए वचन से बात होने के कारण वो उनका वध नहीं करता। इस दिन घटोत्कच ने युद्ध स्थल में आकर कौरवों में तबाही मचा दी, उसे नियंत्रण में कर पाना संभव नहीं था।

तब दुर्योधन ने कर्ण से अमोघ शक्ति का प्रयोग घटोत्कच पर करने के लिए कहा। कर्ण ने अमोघ शक्ति को अर्जुन के वध के लिए बचाकर रखा था, क्योंकि अमोघ शक्ति का प्रयोग केवल एक ही शत्रु के वध के लिए किया जा सकता था। 

दुर्योधन के कहने पर कर्ण ने अमोघ शक्ति से घटोत्कच का वध कर दिया। और भीम ने दुशासन का वध किया। इस दिन दोनों पक्षों को बराबर की हानि हुई।

17. महाभारत युद्ध का सत्तरवा दिन

17 वां दिन महाभारत के सत्तरवें दिन शल्य को कर्ण का सारथी बनाया गया। कर्ण ने  भीम और युधिष्ठिर को पराजित किया परंतु फिर से कुंती को दिए वचन के कारण उनके प्राण नहीं लिए।

इसके पश्चात कर्ण और अर्जुन के मध्य युद्ध हुआ। युद्ध के बीच करण के रथ का पहिया धरती में धंस गया। और वह पहिया निकालने में व्यस्त हो गया इसी के चलते श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्ण का वध करने का आदेश दिया। 

इस प्रकार अर्जुन ने असहाय अवस्था में कर्ण का वध किया। कर्ण  की मृत्यु के पश्चात कौरवो का मनोबल पूरी तरह टूट चुका था। कर्ण  के बाद शल्य को सेनापति घोषित किया गया। और दिन के अंत में शैल्य का वध युधिष्ठिर के द्वारा किया गया।  इस दिन कौरव पक्ष को भयानक क्षति हुई।

18. महाभारत युद्ध का अठारहवां दिन

महाभारत युद्ध का अठारहवां दिन 18 वें और अंतिम दिन कौरवों के श्रेष्ठ योद्धाओं में से केवल तीन शेष थे। अश्वथामा, कृतवर्मा, और कृपाचार्य, अश्वथामा ने प्रतिज्ञा ली कि वो इस दिन पांडवों का वध करेगा। 

इन तीनों योजनाओं के द्वारा रात्रि में पांडवों के शिविर पर आक्रमण किया गया। अश्वत्थामा ने द्रौपदी के पांचों पुत्र पांचालों शिखंडी दुस्धयूम समेत अनेक योद्धाओं का वध किया। पिता की छलपूर्वक मृत्यु से अश्वत्थामा ने बहुत ही आक्रामक रूप ले लिया था।

और उसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया जिससे रणभूमि में भयंकर संहार हुआ। अश्वत्थामा का भयानक रूप देख भगवान कृष्ण ने उसे कलयुग के अंत तक धरती पर भटकने का श्राप दिया। 

इसके पश्चात सहदेव ने शकुनि का वध किया। और भीम ने दुर्योधन के अन्य भाइयों का वध किया। अपने पराजय को देख दुर्योधन एक सरोवर की स्तंभ में जाकर छुप जाता है।

और फिर पांडव द्वारा ललकारे जाने पर दुर्योधन, भीम से गदा युद्ध करता है। और भीम ने छलपूर्वक उसकी जंघा पर प्रहार किया ,जिससे दुर्योधन मृत्यु को प्राप्त हुआ।

इस प्रकार (Mahabharat Yuddh) महाभारत युद्ध में अंततः पांडवों को विजय प्राप्त हुई।  तो यह था महाभारत युद्ध का घटनाक्रम।

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