जानिए क्यों है सर्वश्रेष्ठ निर्जला एकादशी 2021

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निर्जला एकादशी 2021
निर्जला एकादशी 2021

निर्जला व्रत क्या होता है?

निर्जला एकादशी का व्रत सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना गया है, और उसमें भी ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी जिसे निर्जला एकादशी कहा जाता है। ये एकादशी सभी एकादशियों में सर्वोत्तम मानी गई है।

इस एकादशी का व्रत करने से सभी एकादशियों के व्रत समान पुण्य फल की प्राप्ति हो जाती है। जैसे कि जो लोग एकादशी का व्रत नहीं करते हैं, पूरे साल की एकादशी का व्रत नहीं कर रहे हैं, उन्हें इस निर्जला एकादशी का व्रत जरूर करना चाहिए।

इससे पूरे साल की जो 23 एकादशी होती है, उन्हें उसका पुण्यफल आपको प्राप्त होता है, क्योंकि यह एकादशी बहुत ही श्रेष्ठ एकादशी मानी गई है। पूरी तरह से इस एकादशी में निर्जल रहकर व्रत किया जाता है।

निर्जला एकादशी बहुत ही संयम का व्रत होता है। और इस व्रत को बहुत ही कठोरता के साथ कठिन तपस्या के साथ इस व्रत को किया जाता है और बहुत अधिक पुण्य फल प्राप्त होता है। 

साल 2021 में जेष्ठ मास की निर्जला एकादशी कब है। व्रत का पारण हमें कब करना है? तिथि कब प्रारंभ हो रही है। कब समाप्त हो रही है। ये व्रत किस तरह से करना चाहिए? व्रत की विधि क्या है? किस तरह से हम भगवान श्री हरि की आराधना करें? पूजा करें जिससे कि इस व्रत का जो नियम है, उसका पालन हम कर पाए और ये व्रत हमसे अच्छी तरह से निर्माण हो सके। पूरी तरह से निर्जल रहकर हम किस तरह से इस व्रत का पालन करें? कैसे भगवान श्री विष्णु की पूजा आराधना हमें करनी चाहिए?

एकादशी के बारे में जो कि निर्जला एकादशी है। जेष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को भीमसेनी एकादशी कहा जाता है और पांडव एकादशी भी कहा जाता है।

निर्जला एकादशी 2021 कथा

एक कथा है कि एक बार महर्षि व्यास पांडवों के यहाँ पधारे थे, तो भीम ने महर्षि व्यास ने कहा कि हे महर्षि युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, माता कुंती और द्रौपदी सभी एकादशी का व्रत करते हैं, और मुझसे भी रखने को कहते हैं, परन्तु मैं बिना खाये नहीं रह सकता हूँ।

इसलिए 24 एकादशियों पर निराहार रहने का कष्ट जो हैं उसे मुझे बताइए और कोई ऐसा व्रत बताइए जिसे करने में मुझे कोई बहुत असुविधा ना हो और उसका फल भी मुझे प्राप्त हो,और सभी एकादशियों का फल भी मुझे मिल जाए।

महर्षि व्यास जानते थे कि भीम अधिक मात्रा में भोजन करने पर भी उनकी भूख शांत नहीं होती है। महर्षि ने भीम से कहा कि तुम जेष्ठ शुक्ल एकादशी का व्रत रखा करो। इस व्रत में अन्य 23 एकादशियों के पुण्य का लाभ भी मिलेगा और तुम जीवन पर्यंत इस एकादशी व्रत का पालन करो।

तब भीम ने इस एकादशी को किया था और तभी से इस व्रत को निर्जला रखा जाता है और इस एकादशी को भीम एकादशी या फिर पांडव एकादशी,भीमसेनी एकादशी कहा जाता है तो निर्जल रहकर इस व्रत का पालन करना बहुत ही श्रेष्ठ फल देता है।

निर्जला एकादशी क्यों की जाती है?

जो लोग साल की पूरी एकादशी यानी की 24 एकादशियाँ नहीं करते हैं, उन्हें भी निर्जला एकादशी का व्रत जरूर करना चाहिए। क्योंकि ये व्रत भगवान श्रीहरि विष्णु को बहुत प्रिय है और जो भी एकादशी का व्रत करते हैं, श्री विष्णु की कृपा उन्हें प्राप्त होती है। और सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मीलती है।

पूर्व जन्म का पाप, जो हमारे पाप कर्म होते हैं, सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। निर्जला एकादशी का व्रत करने से बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है।

निर्जला व्रत कैसे करते हैं?

अब बात करते हैं कि निर्जला एकादशी व्रत की पूजा विधि क्या है निर्जला एकादशी जैसे की एकादशी के जो व्रत होते हैं, उनमें 3 दिन का नियम होता है।

3 दिन का संगम होता है दशमी से द्वादशी तिथि तक, तो दशमी के दिन से ही तामसिक चीजों से परहेज करना चाहिए।

जैसे की दशमी के दिन ही तामसिक भोजन का प्रयोग नहीं किया जाता है। भोजन में आपके लहसुन प्याज नहीं होना चाहिए और आज आपको जैसे सूर्यास्त होने से पहले ही अन्न ग्रहण करना है।

सूर्यास्त के बाद अन्न ग्रहण नहीं करना है। किसी भी प्रकार के तामसिक विचारों से तामसिक भोजन से दशमी तिथि से लेकर द्वादशी तिथि तक आपको दूरी बनाकर रखनी है।

न तो किसी के बारे में आपको गलत बोलना है, ना कुछ गलत सुनना है, ये आपके व्रत के नियम में ही शामिल होता है, कि हम किस इसी प्रकार से किसी की निंदा नहीं करनी, किसी की चुगली नहीं करनी है।
किसी के भी बारे में अपशब्द नहीं बोलना है। कोई भी ऐसी बात न बोलें किसी को जो उसको बुरी लगे और उसकी आत्मा को दुख हो।

तो इस बात का हमें ध्यान रखना होता है, और शाम के समय जैसे कई अन्य आप पहले लीजिए सूर्यास्त होने से पहले और अगर रात में आपको कुछ खाने का मन है तो आप फल खा सकते हैं, या दूध वगैरह ले सकते हैं तो इस तरह से हमें एकादशी के नियम दशमी से ही पालन करने होते है।

निर्जला एकादशी की पूजा कैसे करें?

दशमी को पूर्ण रूप से आप ब्रह्मचर्य का पालन करें। भूमि पर शयन करने का विधान है। हमारे शास्त्रों में तो संभव हो तो भूमि पर शयन करें. नहीं तो अपना बिस्तर साफ हो इस बात का ध्यान रखें।

शुद्धता का ध्यान रखें, उसके बाद एकादशी के दिन प्रातः काल जल्दी उठना है, और स्नान इत्यादि करने के बाद सबसे पहले सूर्यदेव को जल अर्पित करें।

उसके बाद अपने घर के ईशान कोण भगवान की मूर्ति या प्रतिमा जो भी आपके पास है, उसे स्थापित कीजिए। आप भगवान श्रीविष्णु के किसी भी विग्रह की पूजा कर सकते हैं।

अगर आपके पास शालिग्राम है या फिर ठाकुरजी है, लड्डूगोपालजी है। भगवान श्रीकृष्ण का कोई स्वरूप है, आप उनका अभिषेक कीजिए।

अगर विग्रह है तो और अभिषेक के लिए आप पंचामृत का प्रयोग कर सकते हैं। दूध, दही, घी, शहद, शक्कर मिलाकर और भगवान शिवजी का अभिषेक कीजिए, नहीं तो दूध में केसर मिलाकर भगवान श्री विष्णु का अभिषेक कर सकते हैं।

कच्चा दूध होना चाहिए। आपको इस बात का ध्यान रखना है, गाय का दूध मिल जाए तो सर्वोत्तम होता है। इस तरह से भगवान श्री विष्णु का अभिषेक करने के बाद आपको उन्हें पीले वस्त्र अर्पित करने है।

विधि विधान से उनकी पूजा करनी है। धूप, दीप, नैवेद्य अर्पित करें पीले पुष्प, पीले पुष्पों की माला अर्पित करें और आपको शुद्ध घी का दीपक जलाकर भगवान श्रीहरि विष्णु के मंत्र का जाप करना चाहिए।

भगवान विष्णु के नाम का स्मरण करना चाहिए। विष्णु सहस्रनाम का पाठ आप कर सकते हैं। सुबह चाहे तो भगवद्गीता का पाठ कर सकते हैं, या फिर ओम नमो भगवाते वासुदेवायः इस इस मंत्र का आप अधिक से अधिक जब करें।

तो देखिए जितना समय हम प्रभु के चरणों में बिताएंगे। उतना ही अधिक हम भूख प्यास से वंचित रहेंगे। भगवान श्री विष्णु के चरणों में जितना समय अधिक से अधिक उनके नाम में, उनके मंत्र जाप में या भगवद्गीता में जितना हमारा समय बीतेगा, उतना ही हमें प्यास का एहसास नहीं होगा।

आप इस बात का ध्यान रखें तो अधिक से अधिक समय श्री विष्णु की पूजा आराधना में बिताए और सुबह जब आप संकल्प लेते हैं. तो भगवान श्रीहरि विष्णु से प्रार्थना कीजिए कि हे श्री हरी हमें शक्ति दे कि हम इस व्रत का निर्वाह कर सकें।

पूरे समय निर्जल रहकर निवास करें, तो बहुत अच्छी बात है, और इसके लिए हमें भगवान श्रीहरि विष्णु से प्रार्थना करते रहना चाहिए।

पूरे दिन ये भगवान हमें शक्ति दो कि हम इस व्रत का पालन कर सकें। इस वक्त में सूर्योदय से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक यानी कि वारसी के दिन सूर्योदय तक जब हम पालन करते हैं तब तक हमें जल नहीं लेना होता है।

शाम के समय फिर से आपको भगवान के सामने शुद्ध घी का दीपक जलाना है, और आप उनके सामने उनके मंत्र का उनके नाम का जाप करें।

इस समय भजन कीर्तन करना बहुत श्रेष्ठ होता है, क्योंकि रात्रि जागरण का बहुत महत्व होता है, और रात्रि जागरण हमारे शास्त्रों में सर्वश्रेष्ठ बताया गया है।

एकादशी के दिन तो अगर आप रात में जागरण करते हैं, बहुत अच्छी बात है, क्योंकि रात में आप भगवान के सामने एक दीपक कर्मसाक्षी जलाइए, जो कि आप अलग से एक दीपक आपको अखण्ड जलाना है।

आपको शुद्ध घी डालना है और दो तीन धागे केसर के अगर उपलब्ध हो तो डाल दीजिए नहीं तो कोई बात नहीं। सिर्फ आपको शुद्ध घी का दीपक जलाना है और भगवान श्रीहरि विष्णु के नाम पे ये दीपदान होता है।
हर एकादशी पर अगर आप अखंड दीपक श्री विष्णु के नाम पर जलाते है, तो एक दीपक आपको कर्मसाक्षी अलग से ही चलाना होगा। इस बात को आपको ध्यान रखना है।

आरती करने के लिए आप कपूर जलाकर कपूर से आरती करेंगे। रात्रि जागरण जितना समय कर सकते हैं करिए और उसके बाद आप सुबह उठें, स्नान इत्यादि करने के बाद भगवान श्री हरि विष्णु की पूजा करें उसके बाद आपको पारण करना है, तो पारण के लिए आप पहले किसी जरूरतमंद को या किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं।

उसके बाद आपको भोजन करना चाहिए। अगर उस समय कोई ब्राह्मण उपलब्ध न हो, जिसे आप भोजन करा पाए तो आपको चाहिए कि आप दान की सामग्री यानी कि एक व्यक्ति के लिए कम से कम सामग्री आप निकाल दीजिए।

जैसे कि आटा, दाल, सब्जियां, फल, चीज़ ये सभी चीजें आप निकाल दीजिए। वस्त्र दान करना चाहते हैं, या फिर आप, जो भी चीजें दान करना चाहते है क्योंकि अधिक से अधिक दान का महत्व है।

एकादशी में और निर्जला एकादशी में तो बहुत अधिक दान का महत्व होता है। तो आप दान की सामग्री निकालने के बाद पारण के शुभ मुहूर्त में पारण कर सकते हैं।

निर्जला एकादशी कब है

निर्जला एकादशी की तिथि 20 जून 2021 को शाम 4:21 पर और तिथि समाप्त हो रही है। 21 जून की दोपहर 1:31 पर तो निर्जला एकादशी का व्रत हमें रखना है।

21 जून दिन सोमवार होगा और पारण का शुभ मुहूर्त है 22 जून मंगलवार 5:24 से रात 8:12 तक, तो इस शुभमुहूर्त में हमें व्रत पालन करना है और व्रत हमें बहुत ही नियम के साथ करना है।

एकादशी पर क्या दान करें?

आज हमें कुछ चीजों का दान जरूर करना चाहिए ,जैसे जल से भरे हुए पात्र का दान करना बहुत श्रेष्ठ माना गया है। जल का दान करना, शर्बत का दान करना ,बहुत श्रेष्ठ माना गया है।

जल किसी भी रूप में आप दान कीजिए, किसी पात्र से भरकर दान कीजिए, या फिर आप ऐसे ही कहीं पर प्याऊ की व्यवस्था करवा दीजिए।

जिससे राहगीरों को आप जल दे सकते हैं तो बहुत श्रेष्ठ होगा। मंदिर में जल्द से भरा हुआ घड़ा दान करते हैं, या किसी पुजारी को जल से भरा हुआ घड़ा दान करते हैं, यह बहुत अधिक पुण्य फल देने वाला होता है।

तो आज के दिन जल दान करना बहुत अधिक श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि हम निर्जल रहते हैं और निर्जल व्रत रहकर किसी को पानी पिलाना कितने संयम का काम है, कि हम खुद जल नहीं पी सकते हैं। स्वयं जल नहीं पी रहे हैं, लेकिन दूसरों को मीठा जल बांट रहे हैं।

यह बहुत अधिक पुण्य का काम होता है। आज आप छाता दान करना चाहिए, जूता दान कर सकते हैं, वस्त्रदान कर सकते हैं, खरबूजा आम के लिए इस तरह के जो सीजनल फ्रूट्स है, इस समय में आप उसका दान करें, बहुत श्रेष्ठ होगा।

निर्जला एकादशी पूजा विधि

दोस्तों निर्जला एकादशी पर कौन सी विशेष उपाय करें? किस विधि से पूजा करें? जिससे कि इस व्रत का संपूर्ण लाभ प्राप्त संपूर्ण फल हमें प्राप्त हो, और काफी समस्त कामनाएं श्री हरि विष्णु की कृपा से पूर्ण हो जाए।

तो आज के दिन हमें भगवान श्री विष्णु का अभिषेक करना चाहिए। कच्चे दूध में केसर मिलाकर इससे जीवन की सभी प्रकार की कामनाएं पूर्ण होती है। सुख समृद्धि की प्राप्त प्राप्ति होती है।

जीवन में सफलता की प्राप्ति होती है। श्री विष्णु सहित माँ लक्ष्मी का वास चाहते हैं तो लक्ष्मी नारायण की आराधना करें।

श्री विष्णु और माँ लक्ष्मी की संयुक्त रूप से पूजा करें। माँ लक्ष्मी को फूलों की माला अर्पित करें। श्री हरि विष्णु को आप पीले फूलों की माला अर्पित करें।

संभव हो तो कमल के फूल माँ लक्ष्मी को अगर आप अर्पित करते हैं तो इससे माँ लक्ष्मी की कृपा बहुत ही शीघ्र आपको मानती है।

आपके सभी प्रकार के जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट होकर पुण्य फलों की प्राप्ति होती है। बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है।


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