Mata Ke Nau Roop | नौ रूपों की कथा | मां के 9 रूपों का वर्णन | Navratri 2021

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Mata Ke Nau Roop

Mata Ke Nau Roop | नौ रूपों की कथा | मां के 9 रूपों का वर्णन | Navratri 2021

जाने दुर्गा की नौ शक्तिओ (Mata Ke Nau Roop) से मिलने वाले सुख समृद्धि और धनवर्षा का रहस्य

नवरात्री माँ दुर्गा के नौ स्वरुप नौ दिनों की पूजा करके मनाया जाता है। इस साल नवरात्री 7 अक्टूबर 2021 से शुरू होगी और 14 अक्टूबर 2021 को ख़तम होगी। माँ दुर्गा के नौ रूप अति प्रभावशाली और सर्व मनोकामनाओ को पूर्ण करनेवाली है। कहते है, नवरात्री में माँ के इन नौ रूपों का वर्णन और कथा श्रद्धा भाव से सुनता या सुनाता है, तो माँ उस पर प्रसन्न होती है। और उसपर विशेष कृपा द्रष्टि रखती है। चलिए सुनते है, माँ के कल्याणकारी नौ रूपो का वर्णन एवं कथा।

1. नवरात्रि का पहला दिन

नवरात्री के पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा की जाती है। पुराणों के अनुसार माता शैलपुत्री का जन्म पर्वत राज हिमालय की पुत्री के रूप में हुआ था।

इसीलिए उनका नाम शैलपुत्री है। माँ शैलपुत्री के एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल मौजूद रहता है। माँ शैलपुत्री वृषभ पर बिराजमान है।

माँ शैलपुत्री को सम्पूर्ण हिमालय पर्वत समर्पित है। माँ शैलपुत्री का नवरात्री के पहले दिन विधिपूर्वक पूजन करने से शुभ फल प्राप्त किया जा सकता है।

माना जाता हे, की जिसकी कुंडली में मंगल की स्थिति ख़राब हो उन्हें माँ शैलपुत्री की पूजा करनी चाहिए। माता को सफ़ेद वस्तुए पसंद है।

इसलिए पूजा में सफ़ेद फल, फूल और मिष्ठान चढ़ाना बहोत फलदायी है। कुंवारी कन्याओ का इस व्रत को करने से अच्छे वर की प्राप्ति होती है। माँ शैलपुत्री का पूजा व्रत करने से जीवन में स्थिरता आती है।

Shailputri

माँ शैलपुत्री की कथा:

एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बड़ा यज्ञ करवाया। उसमे उन्होंने सारे देवताओ को यज्ञ में अपना-अपना भाग लेने के लिए निमंत्रित किया। परंतु शिवजी को उन्होंने निमंत्रित नहीं किया। 

जब नारद जी ने माता सती को ये यज्ञ की बात बताई, तब माँ सती का मन वहा जाने के लिए बेचैन हो गया। उन्होंने शिवजी को यह बात बताई तब शिवजी ने कहा – प्रजापति दक्ष किसी बात से हमसे नाराज़ हो गए हे, इसीलिए उन्होंने हमें जान बुजकर नहीं बुलाया, तो ऐसे में तुम्हारा वहा जाना ठीक नहीं है।

यह सुनकर माँ सती का मन शांत नहीं हुआ। उनका प्रबल आग्रह देखकर शिवजी ने उन्हें वहा जाने की अनुमति दे दी। जब माँ सती वहा पहुंची तो उन्होंने देखा की कोई भी वहा पर उनसे ठीक से या प्रेम से व्यव्हार नहीं कर रहा था।

केवल उनकी माता ही उनसे प्रेमपूर्वक बात कर रही थी। तब क्रोध में आकर माता सती ने उस यज्ञ की अग्नि से अपना पूरा शरीर भष्म कर दिया और फिर अगले जन्म में पर्वत राज हिमालय के पुत्री के रूप में जन्म लिया और शैलपुत्री के नाम से जानी गई। 

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2. नवरात्रि का दूसरा दिन

नवरात्री के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। ब्रह्म का अर्थ तपस्या होता हे, और चारिणी का अर्थ आचरण होता है, अर्थात तप का आचरण करने वाली। 

माँ ब्रह्मचारिणी के दाये हाथ में जप के लिए माला हे, और बाए हाथ में कमण्डल है। इन्हे साक्षात ब्रह्म का रूप माना जाता है।

माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से कृपा और भक्ति की प्राप्ति होती है। माँ ब्रह्मचारिणी के लिए माँ पार्वती के वह समय का उल्लेख हे. जब शिवजी को पाने के लिए माता ने कठोर तपस्या की थी।

उन्होंने तपस्या के प्रथम चरण में केवल फलो का आचरण किया और फिर निराहार रहेके कही वर्षो तक तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया। 

देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा से तप, त्याग, संयम की प्राप्ति होती है। माँ का यह स्वरुप अत्यंत ज्योतिर्मय और भव्य है। माता मंगल ग्रह की शाशक हे, और भाग्य की दाता है।

Brahmcharini

माँ ब्रह्मचारिणी की कथा:

माँ सती अग्नि की राख में भष्म होकर दूसरे जन्म में हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और उनका नाम शैलपुत्री रखा गया।

जब वह बड़ी हुई तब नारदजी ने उन्हें दर्शन दिए और बताया की अगर वह तपस्या के मार्ग पर चलेगी, तो उन्हें उनके पूर्व जन्म के पति शिवजी ही वर के रूप में प्राप्त होंगे।

इसीलिए उन्होंने कठोर तपस्या की तब उन्हें ब्रह्मचारिणी नाम दिया गया।  उन्होंने 1000 वर्ष केवल फल, फूल ही खाये और 100 वर्षो तक जमीन पर सोई, कही वर्षो तक कठिन उपवास रखे और खुले आसमान के नीचे शर्दी गरमी और घोर कष्ट सहे।

3000 वर्षो तक टूटे हुए बिल पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना की। उसके बाद कई हजार वर्षो तक निर्जल और निराहार रहकर तपस्या की। 

यह देखकर सारे देवता गण प्रसन्न हो गए और उन्होंने पार्वती जी को बोला की इतनी कठोर तपस्या केवल वही कर सकती हे, इसीलिए उनको भगवान् शिवजी ही पति के रूप में प्राप्त होंगे, तो अब वह घर जाये और तपस्या छोड़ दे। माता की मनोकामना पूर्ण हुई और भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। 

3. नवरात्रि का तीसरा दिन

नवरात्री के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। माँ ने मस्तक पर चन्द्रमा को धारण किया है। 

देवी की सवारी बाघ हे, और दस हाथो में कमल ,धनुष , बाण ,कमण्डल, गदा, पुष्प जैसे अश्त्र है। इनके कंठ में स्वेत पुष्प की माला और शीश पर मुकुट है।

अपने दोनों हाथो से वह साधको को चिरायु, आरोग्य और सुख सम्पति का वरदान देती है। माँ चंद्रघंटा की पूजा नवरात्री के तीसरे दिन करने से भक्तो को जन्म जन्मांतर के कष्टों से मुक्ति मिल जाती है।

Chandraghanta

माँ चंद्रघंटा की कथा:

प्राचीन समय में देव और दानवो का युद्ध लंबे समय तक चला। देवो के राजा इन्द्र और राक्षशो के राजा महिषासुर थे। इस युद्ध में देवता ओ की सेना राक्षशो से पराजित हुई और एक समय ऐसा आया की देवताओ से विजय प्राप्त कर महिसासुर स्वयं इन्द्र बन गया।

उसके बाद देवता भगवान विष्णु और शिवजी की शरण में गए और उन्होंने बताया की महिषासुर ने सूर्य ,इन्द्र , अग्नि , वायु ,चन्द्रमा और अनेक देवताओ के सभी अधिकार छीन लिए है और उनको बंधक बनाकर स्वयं स्वर्गलोक का राजा बन गया है।

यह सुनकर भगवान विष्णु और शिवजी को अत्यंत क्रोध आया। इसी समय ब्रह्मा, विष्णु, और शिवजी के क्रोध के कारण एक महा तेज प्रकट हुआ। और अन्य देवताओ के शरीर से भी तेजमय शक्ति बनकर एकाकार हो गई। 

यह तेजमय शक्ति एक पर्वत के समान थी। उसकी ज्वालाएं दसो दिशा में व्याप्त होने लगी। जिसके प्रभाव से तीनो लोक भर गए। समस्त देवताओ के तेज से प्रकट हुई देवी को देखकर देवताओ की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। 

भगवान शिव ने उन्हें एक त्रिशूल दिया और भगवान विष्णु ने उन्हें एक छत्र प्रदान किया। इसी प्रकार सभी देवताओ ने देवी को अनेक प्रकार के अश्त्र शस्त्र दिए। 

इन्द्र ने अपना वज्र और एक घंटा देवी को दिया। इसी प्रकार सभी देवताओ ने मिलकर देवी के हाथ में अनेक प्रकार के अश्त्र शश्त्र सजा दिए और वाहन के रूप में बाघ को दिया। और इसके बाद माँ चंद्र घंटा ने महिषासुर और उसकी सेना के साथ युद्ध किया और महिषासुर एवं अनेक अन्य राक्षशो का वध कर दिया। 

4. नवरात्रि का चौथा दिन

नवरात्री के चौथे दिन माँ कुष्मांडा की पूजा की जाती है। कुष्मांडा माता ने अपनी मुस्कान से ब्रह्माण्ड की रचना की थी, इसीलिए इन्हे सृष्टि की आध्यशक्ति के रूप में जाना जाता है।

कुष्मांडा माता का रूप बहोत ही शांत , सौम्य और मोहक माना जाता है। इनकी आठ भुजाए हे इसीलिए इनको अष्ट भुजा भी कहते है।

इनके सात हाथो में कमण्डल ,धनुष , बाण , फल , पुष्प , अमृत , कलश , चक्र ,गदा है। आठ में हाथ में सभी सिद्धि को देने वाली जप की माला है।

माता का वाहन शेर है। माता के पूजन से भक्तो से सभी कष्टों का नाश होता है। माँ कुष्मांडा का नाम का मतलब हे, एक ऊर्जा का छोटा सा गोला। एक ऐसा पवित्र गोला जिसने इस समस्त ब्रह्माण्ड की रचना की। 

Kushmanda

माँ कुष्मांडा की कथा:

जब यह सृष्टि अंधकार में थी, तब एक छोटे से ऊर्जा के गोले ने जन्म लिया और यह गोला चारो तरफ प्रकाशित होने लगा। और फिर उस गोले ने एक नारी का रूप लिया। 

वह कुष्मांडा माँ के नाम से प्रचलित हुई। इनका स्थान सूर्य मंडल भीतरी लोक में है। सूर्य मंडल में निवास करने की क्षमता और किसी में नहीं है।

माता ने सबसे पहले तीन देवीओ की रचना की वह तीन देविया माँ महालक्ष्मी , माँ महाकाली , और माँ सरस्वती थी। महाकाली के शरीर से एक नर और नारी ने जन्म लिया। 

नर के पांच सिर और दस  हाथ थे, उनका नाम शिव रखा गया और नारी का एक सिर और चार हाथ थे, उनका नाम उन्होंने सरस्वती रखा। 

महालक्ष्मी के शरीर से एक नर और नारी का जन्म हुआ। नर के चार हाथ और चार सिर थे , उनका नाम ब्रह्मा रखा और नारी का नाम लक्ष्मी रखा गया।

फिर माँ सरस्वती के शरीर से एक नर और एक नारी का जन्म हुआ। नर का का एक सिर और चार हाथ थे। उनका नाम विष्णु रखा और महिला का एक शिर और चार हाथ थे , उसका नाम शक्ति रखा।

माँ ने भगवान शिव को शक्ति, ब्रह्मा जी को सरस्वती और विष्णु जी को लक्ष्मी पत्निओ के रूप में प्रदान किये। माँ ने अनेक देवी देवता ओ की रचना की। इसीलिए इन्हे सृष्टि की रचयिता माना जाता है।

5. नवरात्रि का पांचवा दिन

नवरात्री के पांचवे दिन माँ स्कंदमाता की पूजा की जाती है। स्कंदमाता नाम दो शब्दों से मिलकर बनता है।

स्कंद और माता। स्कंद भगवान कार्तिकेय का दूसरा नाम है। कार्तिकेय भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र है। इसीलिए स्कंद माता का अर्थ हे, कार्तिकेय की माता।

माता की चार भुजाए हे। वह एक हाथ में कार्तिकेय को पकडे हुए हे, दूसरे और तीसरे हाथ में कमल रखती हे, और चौथे हाथ से भक्तो को आशीर्वाद देती है।

उनका वाहन शेर है, और वह कमल पर बिराजमान है। स्कंद माता विशुद्ध चक्र की अधिष्ठात्री देवी है।

विशुद्ध चक्र हमारे गले के उभरे हुए भाग के ठीक नीचे स्थित होता है। स्कंद माता की पूजा करने से विशुद्ध चक्र जागृत होता हे, और उस व्यक्ति को वाणी की सिद्धि प्राप्त होती है।

व्यक्ति का आयुष्य बढ़ता हे, और वह विध्वान बनता है। इनकी पूजा से सोलह कलाओ और सोलह विभूतिओं का ज्ञान होता है।

Skandmata

माँ स्कंदमाता की कथा:

सती जब अग्नि में जलकर भष्म हो गई, उसके बाद शंकर भगवान सांसारिक मामलो से दूर हो गए और कठिन तपस्या में लग गए।

उसी समय देवता गण तारकासुर के अत्याचार भोग रहे थे। तारकासुर को वरदान था, की केवल भगवान शिव की संतान उसका वध कर सकती हे। बिना सती के संतान नहीं हो सकती थी।

इसीलिए सारे देवता भगवान विष्णु के पास गए, तब विष्णुजी ने उनको कहा की यह सबकी वजह आप लोग ही हो ,अगर आप सब राजा दक्ष के वहा बिना शिवजी के नहीं गए होते, तो सती को अपना शरीर नहीं छोड़ना पड़ता।

उसके बाद भगवान विष्णु देवताओ को माता पार्वती के बारे में बताते हे, जो सती माता की अवतार है। तब नारदमुनि माता पार्वती के पास जाकर उन्हें तपस्या करके भगवान शिव को प्राप्त करने को कहते है।

माँ पार्वती की हजारो वर्षो की तपस्या के बाद भगवान शिव उनसे विवाह करते है। उन दोनों की ऊर्जा से एक ज्वलंत बीज पैदा होता है।

उस बीज से छः मुख वाला कार्तिकेय जन्म लेता है। और फिर कार्तिकेय तारकासुर का एक भयंकर युद्ध में वध कर देता है। तभी से स्कंद माता एक सर्व श्रेष्ठ पुत्र कार्तिकेय की माता के नाम से जानी जाती है।

6. नवरात्रि का छठा दिन

नवरात्री के छठे दिन माँ कात्यायनी की पूजा होती है। माँ कात्यायनी की पूजा करने से भक्तो को अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारो फलो की प्राप्ति हो जाती है।

सभी रोग, भय आदि दूर हो जाते है। माँ कात्यायनी की कृपा से शादी में आनेवाली बाधाए दूर हो जाती हे, और बृहस्पति शादी के योग भी बनते है। और इनकी पूजा से वैवाहिक जीवन भी अच्छा रहता है।

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माँ कात्यायनी की कथा:

पुराणों के अनुसार महर्षि कात्यायन ने माँ आध्यशक्ति की घोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर माँ ने उन्हें उनके यहाँ पुत्री के’रूप में जन्म लेने का वरदान दिया था।

माँ का जन्म महर्षि कात्यायन के आश्रम में हुआ था। कहते हे, जिस समय महिषासुर का अत्याचार बहुत बढ़ गया था, तब त्रिदेवो के तेज से माँ की उतपत्ति हुई थी।

माँ ने दशमी तिथि के दिन महिषासुर नाम के राक्षश का वध किया था। इसके बाद शुंभ निशुंभ ने भी स्वर्ग लोक पर आक्रमण करके इन्द्र का सिंहासन छीन लिया था।

उनका अत्याचार बढ़ने से माँ ने उनका भी वध कर दिया था। इस तरह अगर माँ कात्यायनी की पूजा की जाये, व्रत को पढ़ा या सुना जाये, माँ उनके शत्रुओ से उनकी रक्षा सदेव करती है।

7. नवरात्री का सातवा दिन

नवरात्री के सातवे दिन माँ कालरात्रि की पूजा की जाती है। काल अर्थ मृत्यु होता हे,और रात्रि का अर्थ अंधकार होता है।

अतः कालरात्रि का अर्थ अंधकार व् अज्ञानता की मृत्यु होता है। माँ कालरात्रि दुर्गा का सबसे भयंकर रूप है।

कालरात्रि माँ का रूप गहरा है। माँ के गले में विध्युत की माला और बाल बिखरे हुए है। माँ कालरात्रि के चार हाथ हे,और उनका एक हाथ वर मुद्रा में है, जिसे वह भक्तो को आशीर्वाद देती है।

दूसरा हाथ अभय मुद्रा में हे, जिसे वह भक्तो की रक्षा करती है। तीसरे हाथ में उन्होंने वज्र पकड़ा हे, और चौथे हाथ में नुकीला कांटा है।

माँ कालरात्रि का वाहन गधा है। माँ की पूजा करने से व्यक्ति अपने क्रोध पे नियंत्रण ला सकता है। नवरात्रि का सातवा दिन तांत्रिक क्रिया के साधना करने वाले लोगो के लिए अति महत्वपूर्ण है।

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माँ कालरात्रि की कथा:

प्राचीन समय में शुंभ निशुंभ दैत्योने अपने बल से इन्द्र का राज्य छीन लिया था और उनके अत्याचार देवताओ पे बहोत बढ़ गए थे। 

तब वह मदद मांगने हिमालय  पर्वत पर जाकर माँ भगवती की स्तुति करते है। माँ पार्वती को जब इनके बारे में पता चलता हे, तब उनके शरीर से अंबिका निकली तो पार्वती ने अंबिका को दैत्यों के संहार के लिए भेजा। 

युद्ध में शुंभ और निशुंभ ने दो राक्षशो चंड और कुंड को भेजा। अंबिका देवी ने चंड और कुंड से लड़ने के लिए काली देवी का निर्माण किया। और काली माता ने चंड और कुंड का वध किया, इसीलिए वह चामुंडा के नाम से जानी जाने लगी।

इसके बाद शुंभ और निशुंभ ने रक्तबीज नामक अति पराक्रमी राक्षश को भेजा। उसको ब्रह्मा जी से वरदान था, की जब उसकी एक भी रक्त की बून्द जमीन पर गिरेगी, वह दूसरा रक्तबीज बन जायेगा।

जिसे उसके जैसा पराक्रमी पैदा हो जायेगा। युद्ध में जब रक्तबीज का रक्त गिरते ही वहा पे बहुत सारे दानव पैदा हो गए, तब देवताओ का भय बढ़ गया।

उनका भय देखकर अंबिका माँ ने माँ काली से कहा – हे! चामुंडे! अपने रूप को बड़ा करो और रक्तबीज से उत्त्पन हुए सारे महाअसुरो का भक्षण करो।

उसके बाद काली माँ ने अपना रूप बड़ा करके अपने त्रिशूल से रक्तबीज पर प्रहार किया, तब रक्तबीज के शरीर से जो भी रक्त निकला उसको माँ ने पी लिया और उसके बाद माँ ने रक्तबीज को वज्र , बाण , खड़क से मार डाला। माँ कालरात्रि दुष्टो का नाश करने वाली है, और क्रूरता को ख़तम करनेवाली है।

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8. नवरात्री का आठवा दिन 

नवरात्री के आठवे दिन माता महागौरी की पूजा की जाती है। माँ महागौरी की पूजा अर्चना से भक्तो के सारे कष्ट दूर होते है।

महागौरी के तेज से ही सम्पूर्ण विश्व प्रकाशमान होता है। इनकी शक्ति अमोग फल देने वाली है। इनके पूजा से सौभाग्य में वृद्धि होती है।

माता ने महा तपस्या करके गौर वर्ण को प्राप्त किया है। इसीलिए इनको महागौरी कहते है। माँ के चार हाथ है।

इनके दायने तरफ के ऊपर वाले हाथ में त्रिशुल धारण किया है, और निचे वाला हाथ वरदायिनी मुद्रा में है।

बायें तरफ के ऊपर वाले हाथ में अभय मुद्रा धारण किये हुए है, और नीचे वाले हाथ में डमरू को धारण किया है। माँ का वाहन बैल है।

Mahagauri

महागौरी की कथा:

माता पार्वती ने  शिवजी के लिए कही सालो तक कठोर तपस्या की थी।  जब भगवान शिव उनसे प्रसन्न हुए, तब उन्होंने माता को वरदान मांगने को कहा। 

माता ने वरदान में उन्हें ही मांग लिया। माता के कही सालो तक जंगल में रहने से और भूखे प्यासे रहने से वह काफी दुर्बल और उनका रंग काला हो गया था, इसीलिए शिवजी ने उनपे कमण्डल डालकर उन्हें गौर वर्ण दिया, तब से वह महागौरी के नाम से जानी जाती है।

दूसरी कथा यह हे, की जब माता जंगल में तपस्या कर रही थी, तब एक सिंह वहा आ पंहुचा और वह भूखा था, इसीलिए माता को देख उसे लालच आ गया। 

परंतु माता तपस्या में लीन थी, इसीलिए वह सिंह वहीं बैठ माता की तपस्या ख़तम होने का इंतज़ार करता रहा। सिंह भी तपस्या के दौरान काफी दुर्बल हो गया, इसलिए जब माता तपस्या से उठी तब उन्होंने सिंह को देखा और उसपे दया आ गई।  इसीलिए माता ने उसे अपना वाहन बना लिया। तब से माता के दो वाहन है, बैल और सिंह।

9. नवरात्री का नौवा दिन

नवरात्री के नौवे दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। सिद्धि का अर्थ अलौकिक शक्ति और दात्री का अर्थ दाता या प्रदान करने वाली होता है। 

सिद्धिदात्री का यह स्वरुप सभी दिव्य आकांक्षाओं को पूर्ण करने वाला होता है। इस रूप में माँ कमल पर बिराजमान है। माता के चार हाथ है।

उनके चारो हाथो में कमल, गदा, चक्र और शंख धारण करती हे। माता का वाहन सिंह है। माता अज्ञानता दूर करनेवाली है।

पुराणों के अनुसार माँ सिद्धिदात्री की पूजा करने से अणिमा, महिमा, गरीमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व आठ सिद्धियाँ प्राप्त होती है। और असंतोष, आलस्य, ईर्ष्या, द्रेष आदि से छुटकारा मिलता है।

Siddhidatri

सिद्धिदात्री माता की कथा:

पुराणों के अनुसार भगवान शिव ने माँ सिद्धिदात्री की पूजा करके सभी प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त किया था। उनका आधा शरीर स्त्री का हो गया था।

इसीलिए उन्हें अर्ध नारेश्वेर के नाम भी जाना जाता हे। एक समय पे जब सृष्टि में अंधकार छा गया था। तब एक दिव्य शक्ति ने जन्म लिया, जो महाशक्ति के आलावा कोई नहीं थी।

देवी शक्ति ने ब्रह्मा, विष्णु, और महादेव की त्रिमूर्ति को जन्म दिया और तीनो को दुनिया के लिए अपने कर्तव्यों को निभाने के लिए अपनी भूमिकाओं को समझने की सलाह दी। 

उनके कहे अनुसार त्रिदेव एक महासागर के किनारे बैठ गए और कई वर्षो तक तपस्या की तब माँ देवी ने सिद्धिदात्री के रूप में उन्हें दर्शन दिए और तीनो को अपनी शक्तिओ के रूप में पत्निया दी, ताकि वो लोग उनकी मदद से सृष्टि रचना का कारोभार कर सके। और धीरे धीरे सृष्टि में सब कुछ निर्माण हुआ। इस तरह माँ सिद्धिदात्री की कृपा से सृष्टि की रचना, पालन, संहार का कार्य संचालित हुआ।


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