कनखल हरिद्वार में स्थित 11 मंदिर का महत्व

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कनखल हरिद्वार
कनखल हरिद्वार

कनखल का अर्थ क्या है?

कनखल उत्तराखंड के तीर्थो में से एक माना जाता है। कनखल अर्थात एक खल, अर्थात पाप से मुक्ति।

हरिद्वार से कनखल कितना दूर है?

कनखल हरिद्वार से 3 किलोमीटर की दुरी पर दक्षिण दिशा में पड़ता है।

दक्ष प्रजापति कौन है?

अब हम आपको लिए चलते हैं एक पौराणिक नगरी कनखल में जहा शिव पुराण अनुसार यह नगरी कभी राजा दक्ष प्रजापति की राजधानी हुआ करती थी। यह हरिद्वार से दक्षिण दिशा में स्थित है। कनखल भी एक प्राचीन नगरी है। यह स्थान कभी प्रजापति दक्ष की राजधानी हुआ करता था। प्रजापति दक्ष तब ब्रह्माण्ड के अधिपति थे, और उन्हीं के आदेश पर अन्य प्रजापति अपना शासन चलाते थे। प्रजापति दक्ष इतने वीर और पराक्रमी थे, कि उस समय उनकी मर्जी के बिना कुछ भी संभव नहीं हो पाता था। परन्तु मान सम्मान, ऐश्वर्य और सत्ता ने उनके स्वभाव में अभिमान का ज़हर घोल दिया था। उनका घमंड दिनों दिन बढ़ता ही गया। और 1 दिन उन्होंने अहंकार के नशे में भगवान शंकर का ही अपमान कर दिया।

सभी देवता और ऋषि मुनि प्रजापति दक्ष के दुस्साहस से दंग रह गए, परंतु महादेव शंकर ने प्रजापति दक्ष के अपशब्दों को चुपचाप सुन लिया। 

वो घटना प्रयाग में घटी थी जहाँ ऋषि मुनियों ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था। भगवान शंकर शांत भाव से वहा से चले गए। बात यहीं खत्म हो जाती तब भी गनीमत होती।

लेकिन प्रजापति दक्ष को तो अहंकार ने जैसे पागल ही कर दिया था। अभी प्रयाग की घटना को भुलाया भी नहीं जा सका था, कि प्रजापति दक्ष कनखल में एक और कारनामा कर डाला।

अपनी राजधानी कनखल में उन्होंने भी एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। पुरानो में लिखी गई विवरण के अनुसार वैसा विशाल यज्ञ न कभी पहले हुआ था और नहीं बाद में कभी हो पाया।

उस यज्ञ में अपने समय के सभी प्रजापति, महर्षि, ऋषि, मुनि, देवता, गंधर्व और अन्य महत्वपूर्ण लोगों को आमंत्रित किया गया था।

परंतु आश्चर्य, प्रजापति दक्ष ने महादेव शिव को छोड़कर सभी छोटे बड़े प्राणियों को इसमें शामिल होने का निमंत्रण दिया गया था।

जिससे दक्ष की पुत्री माता सती अपमान सहन न कर सकी, तथा इसी हवनकुंड में आहुति दे दी। इस पर भगवान शिव क्रोधित हो गए तथा रुद्र रूप धारण करके महाराजा दक्ष का शीर्ष उतार दिया। और सम्पूर्ण यज्ञ का विध्वंस कर दिया।

तत्पश्चात सभी देवी देवताओं द्वारा पूजा अर्चना करने के बाद भगवान शिव शांत हुए और दक्ष प्रजापति को बकरे का शीर्ष लगाकर उनका उद्धार किया।

इस मंदिर में सभी द्वारों का नाम वेदों के नामों पर रखा गया है।  

1. सतीकुंड

सतीकुंड इस मंदिर में वह यज्ञ कुंड आज भी है, जिसे सतीकुंड के नाम से जाना जाता है। यहाँ पर स्थित प्राकृतिक पिंडी का दर्शन अविस्मरणीय एवं अद्भुत है।

वट वृक्ष इसी मंदिर के प्रांगण में एक विशाल एवं प्राचीन वटवृक्ष भी है, जिसपर श्रद्धालु कलावा बांधकर अपनी मनोकामना मांगते हैं।

2. गंगा मंदिर

प्राचीन गंगा मंदिर वट वृक्ष के बिल्कुल सामने स्थित है, प्राचीन गंगा मंदिर जिसमें मुख्यता स्वयं गंगा मैया, भगवान शिव के भागीरथ सजीव रूप में विराजमान है।

एसी मंदिर के नजदीक ही सती माता के पावन चरणों का प्रतीक गंगा माता की जलधारा के समीप विद्यमान है। भक्त जनों के लिए इन चरणों का दर्शन किसी तीर्थ से कम नहीं है।

3. इच्छा प्रदान हनुमान मंदिर

इस मंदिर के बाई और प्रांगण में स्थित है, इच्छा प्रदान हनुमान मंदिर, जैसा कि इस मंदिर के नाम से ही ज्ञात है, यहाँ पर भगवान बालाजी महाराज भक्तों की हर इच्छा पूरी करते हैं। 

4. शनिदेव मंदिर

शनिदेव मंदिर इच्छा प्रदान हनुमान मंदिर के समीप ही स्थित है, यह कष्ट निवारक शनिदेव मंदिर जिसमें विराजमान शनि देव शीला रूप में भक्तों के दुख हर लेते हैं। 

5. पारदेश्वर महादेव

पारदेश्वर महादेव दक्षेश्वर महादेव मंदिर के मुख्यद्वार से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, यह अद्वितीय व अनोखा मंदिर इसमें भगवान शिव 151 किलोग्राम के शुद्ध पारे के स्वरूप में विराजमान है।

तथा इसके साथ साथ इसी के प्रांगण में एक प्राचीन रुद्राक्ष वृक्ष भी है। जिसके चबूतरे पर संपूर्ण भारत में स्थित 12 ज्योतिर्लिंगों का प्रतिरूप रखा गया है, जिनकी परिक्रमा विशेष लाभदाई है।

6. संतोषी माता मंदिर

संतोषी माता मंदिर एक विशालकाय आश्रम है, जिसमें स्थित मंदिर में मुख्यता माता वैष्णो का स्वरूप धातु प्रतिमा के रूप में विराजमान है, जिसकी कारीगरी आपको प्रफुल्लित कर देगी। इसके अलावा इसकी प्रांगण में माँ दुर्गा अपने अनेकों रूपों में अपने वाहनों के साथ सुंदर रूप में चित्रित हैं। 

7. पायलट बाबा मंदिर

पायलट बाबा मंदिर अपने आप में एक पाश्चात्य वे भारतीय भवन निर्माण की कला का एक अद्भुत एवं अनुपम नमूना है। इसमें मुख्यता विशाल कमल में स्थापित शिवलिंग दर्शनीय है।

8. दरिद्रभंजन महादेव मंदिर

दरिद्रभंजन महादेव मंदिर यह मंदिर मुख्यता कनखल में स्थित भगवान शिव को समर्पित है। यहाँ पर प्राकृतिक शिवलिंग है, तथा यह मंदिर श्मशान घाट के समीप स्थित है।

पंडित कृष्ण देव दीक्षित द्वारा इस मंदिर का निर्माण सिरसा के राय साहब द्वारा सन् 1952 में करवाया गया था, तथा इस मंदिर में लगातार 40 दिन तक भगवान शिव की पूजा अर्चना करने पर भगवान शिव भक्त की दरिद्रता दूर कर देते हैं। 

9. दुखभंजन मंदिर

दुखभंजन मंदिर यह मंदिर शमशान घाट के मुख्य द्वार के सामने स्थित है। मान्यता अनुसार यहाँ विधि विधान से की गई पूजा, अर्चना से महादेव भक्तों के दुख हर लेते हैं।

10. गीता आश्रम

गीता आश्रम यह मंदिर मुख्यता पारदेश्वर महादेव मंदिर के सामने स्थित है, तथा इसमें माता की प्रतिमा स्थापित है।

11. तिल भागेश्वर

तिल भागेश्वर यह मंदिर अपने आप में अनूठा एवं अदभूत है। कहा जाता है, कि यहाँ पर स्थित प्राचीन शिवलिंग शुक्ल पक्ष में तिल के बराबर बढ़ता और कृष्ण पक्ष में घटता है, इसलिए इस पर मात्र तिल का तेल ही चढ़ाया जाता है।  

मान्यता है, कि यहाँ की यात्रा न करने पर हरिद्वार की यात्रा को संपूर्ण नहीं माना जाता। इसीलिए कनखल का अधिक महत्व है।