राधा रानी मंदिर बरसाना | Barsana Temple History in Hindi

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श्री राधा रानी मंदिर बरसाना | Barsana Temple History in Hindi
श्री राधा रानी मंदिर बरसाना | Barsana Temple History in Hindi

श्री राधा रानी मंदिर बरसाना | Barsana Temple History in Hindi

बरसाना क्यों प्रसिद्ध है?

मथुरा शहर के बरसाना में एक राधा रानी का मंदिर है, जिसे बरसाना मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह एक पवित्र धार्मिक स्थल है। यह मंदिर बरसाना के बीच में एक पहाड़ी के उपर स्थित है।

राधा रानी मंदिर बरसाना अत्यंत सुंदर मंदिर है। इस मंदिर के और दो नाम है। एक ही बरसाने की लाडली जी का मंदिर और दूसरा राधा रानी महल। ऐसा माना जाता है, की हिंदू धर्म में भाद्रपद महीने की शुक्लपक्ष की अष्टमी को राधा जी का जन्म हुआ था। इसीलिए इस दिन को राधाष्टमी का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन राधा जी की पूजा अर्चना की जाती है।

बरसाना का इतिहास

राधा रानी मंदिर बरसाना को अति प्राचीन और पौराणिक स्थल माना जाता है। यहां चारो ओर कही आध्यात्मिक स्थल तथा मंदिर बने हुए है।
यहां पर चार पहाड़ है। जो भानुगढ़, दानगढ़, विलासगढ़ और मानगढ़ के नाम से प्रख्यात है। इन चारो को ब्रह्माजी के चार मुख कहते है।

राधा रानी मंदिर बरसाना मंदिर 250 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। इस मंदिर का निर्माण 1675 में हुआ था। राजा वीरसिंह ने इसे बनवाया था। यह मंदिर लाल पीले पत्थरों से बनया गया है। कहते है, की यह मंदिर का निर्माण 5000 साल पहले किया गया था। इस मंदिर का निर्माण कृष्ण के पौत्र वज्रनाभ के द्वारा किया गया था।

मान्यता के अनुसार कृष्ण के पिता नंद जी थे, जो की गोकुल के मुखिया थे, और राधा के पिता वृषभानु थे, जो की रावल के मुखिया थे। दोनो ही बहुत अच्छे दोस्त थे।

मथुरा के राजा कंस के अत्याचारों के कारण गोकुल और रावल दोनो के ही रहवासी परेशान थे। इसीलिए दोनो नगर के रहवासी गोकुल और रावल छोड़कर नंदगांव और बरसाना में बस गए।

नंदबाबा ने नंदीश्वर को अपना घर बना लिया और वृषभानु ने भानुग्रह पर्वत को अपना घर बना लिया, जो राधा का जन्म स्थल कहा जाता है। बरसाना के ये दोनो ही नगरों में बहुत सारे मंदिर राधा और कृष्ण के नाम पे बनाए गए है। नंदगांव के मंदिर को नंदभवन कहा जाता है, और बरसाना के मंदिर को राधा रानी मंदिर कहा जाता है।

बरसाना की कहानी

एक अन्य कथा के अनुसार ब्रह्मा जी कृष्ण की लीलाएं देखने के लिए व्रज में निवास करना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने विष्णु जी से प्रार्थना की थी, की आप जब द्वापर युग में ब्रज में राधा जी तथा गोपियों के साथ रास लीलाएं करे, तो मुझे भी उसका आनंद लेने का मौका दे, तथा अपनी वर्षा ऋतु की लीलाओ को भी आप मेरे शरीर पर करे और मुझ पर कृपा करे।

प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी से कहा, आप द्वापर युग में ब्रज में जाए और व्रजभानुपुर में पर्वत का रूप धारण करे। उसी पर्वत पर आके में राधा और गोपियों के साथ रास लीलाएं करूंगा और आप निहार सकेंगे तथा पर्वत होने से वर्षाऋतु में भी वह जगह सुरक्षित रहेगी। इसीलिए कहते है, की बरसाना में एक पर्वत है, जो ब्रह्मा स्वरूप में विराजित है।

राधाष्टमी का दिन यहां पर बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। इस त्योहार का आयोजन थोड़े दिनोनपाह ही शुरू कर दिया जाता है। इस दिन राधाजी की पूजा अर्चना की जाती है, तथा उनको छप्पन भोग भी लगाया जाता है।

यहां पर कृष्ण जन्माष्टमी, गोवर्धन पूजा, होली जैसे त्योहार भी बड़े अच्छे से मनाए जाते है। बरसाना में राधाष्टमी से लेकर चतुर्दशी तक मेला भी लगाया जाता है। राधाजी को लड्डुओं का प्रसाद लगाया जाता है, और उसको मोर को खिलाया जाता है, क्युकी मोर को राधा कृष्ण का प्रतीक मानते है।

कहा जाता है, की जैसे कृष्ण जी ने अपने सखाओ के साथ मिलकर नंदगांव में खेल खेलते थे, वैसे ही राधाजी ने बरसाना में अपना बचपन अपनी सहेलियों के साथ बिताया था।

बरसाने में होली के त्योहार का भी अत्यंत महत्व है, क्युकी इस त्योहार को सबसे पहले राधा कृष्ण ने खेला था। बरसाने की होली के त्योहार पर बहुत श्रद्धालु इक्कठे होते है।

इस दिन नंदगांव से आए गोप के साथ बरसाने की गोपियां होली खेलती है। गोप सारी गोपियों पे रंग डालते थे, तो गोपियां को लाठियो से कपड़े से बनाए गए कोड़ों से मारती है। इसे लठमार होली कहते है। यहां होली का उत्सव 45 दिन तक मनाया जाता है।

राधा रानी के मंदिर में कितनी सीढ़ियां हैं?

राधा रानी मंदिर बरसाना में जाने के लिए 200 से ज्यादा सीडिया चढ़नी होती है।

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मथुरा से नंदगांव बरसाना कितनी दूर है?

राधा रानी मंदिर बरसाना मथुरा रेलवे स्टेशन से 50 किमी दूरी पर स्थित है। बरसाना मथुरा से बस, कार या तो टैक्सी से पहुंचा जा सकता है।

राधा अष्टमी कब मनाई जाती है?

राधाअष्टमी का त्योहार जन्माष्टमी के 15 दिन बाद आता है।

कहते है, की राधा जी की आठ सखियों के निवास स्थान भी यही पर है। मान्यता के अनुसार कृष्ण और उनके सखा वहा की गोपियों की मटकियां फोड़कर दही दूध चुरा लेते थे। गोपियां दही दूध लेकर जिस मार्ग से जाती थी, वह मार्ग यहां पर सांकरी खोर मार्ग के नाम से प्रसिद्ध है। जो दो पहाड़ियों के बीच में है।

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