राजसूय यज्ञ क्यों किया जाता था ? Rajsuya Yagya

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राजसूय यज्ञ
राजसूय यज्ञ क्यों किया जाता था

राजसूय यज्ञ क्यों किया जाता था ? Rajsuya Yagya

राजसूय यज्ञ (Rajsuya Yagya) एक वैदिक काल से चला आ रहा एक यज्ञ समारोह है।  इसका वर्णन यजुर्वेद में किया गया है। जिन प्राचीन राजाओ ने यह यज्ञ किया था, वे राजा हरिश्चंद्र, श्री राम, धर्मराज युधिष्ठिर और सभी प्रमुख बड़े राजाओ द्वारा किया गया था।

कोई भी राजा जो खुद को सबसे बलवान, पराक्रमी और सम्राट राजा बनने की इच्छा रखता था, वह इस यज्ञ अनुष्ठान का आयोजन करता था। इस अनुष्ठान को जो भी राजा करता था।

इस यज्ञ को करने वाला राजा, हर एक राज्य में अपना यज्ञ का घोडा दौड़ाते थे। इसका मतलब यह हुवा की दूसरे राजाओ को अगर कोई आपत्ति नहीं है।

तो वह उन राजा से सहमत होकर उस घोड़े को नमन करते थे। और उन राजाओ को उस राजा की छत्रछाया में रहना पड़ता है। परन्तु अगर किसी राजा को आपत्ति होती, तो वह उसका विरोद्ध करता, फिर उस राजा को अपने आप को बेहतर साबित करने के लिए उसके साथ युद्ध करना पड़ता।

यह काम इतना आसान नहीं था। युधिष्ठिर को भी उसका सामना करना पड़ा था। जब उन्होंने अपने पांडव भाइयों को देश के चारों और भेजा तो कुछ ने उन्हें सम्राट मान लिया, तो कुछ ने उनका विरोद्ध किया। जैसे जरासंध सहमत नहीं हुवा था , और फिर जरासंध हार कर, मारा गया।

एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने मंत्रियों से राज्य के संबंध में उनकी राय मांगी थी। तब सभी मंत्रियों ने एक स्वर में यह कहा था, कि राजसूय यज्ञ के अभिषेक से राजा सारी पृथ्वी का एकछत्र स्वामी हो जाता है। 

तथा आप सम्राट होने के योग्य है। इसलिए आप अवश्य यज्ञ कीजिए। मंत्री मंडल से बात करने के बाद, युधिष्ठिर ने अपने भाइयों महर्षि व्यास तथा ऋषियों आदि से परामर्श किया था।

तब उन सभी लोगों ने भी यही कहा था, कि आप राजसूय यज्ञ करने के सर्वथा योग्य है। इसके बाद भी धर्मराज युधिष्ठिर अपने मन में राजसूय यज्ञ करने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे।

अंत में उन्होंने विचार किया कि, भगवान श्रीकृष्ण ने ही इसका ठीक ठीक निर्णय कर सकते हैं। मन में ऐसा विचार आते ही युधिष्ठिर ने अपना एक दूत भगवान श्रीकृष्ण के पास भेज दिया।

दूत ने जब जाकर भगवान श्रीकृष्ण को यह बताया कि राजा युधिष्ठिर आपसे मिलना चाहते हैं तो भगवान श्रीकृष्ण स्वयं ही युधिष्ठिर से मिलने के लिए इंद्रप्रस्थ चले आए थे।

तब धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्णा से कहा था, कि मैं राजसूय यज्ञ करना चाहता हूँ, परन्तु यदि चाहने भर से नहीं हो सकता है, आप सही सही बताइए कि मुझे क्या करना चाहिए? तब भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से यह कहा था कि आप राजसूय यज्ञ के वास्तव में अधिकारी हैं। 

परंतु इस समय राजा जरासंध ने अपने बाहुबल से कई राजाओं को हराकर अपने किले में कैद कर रखा है। इस समय वही सबसे प्रबल राजा है। यदि हम अस्त्रशस्त्रों के द्वारा 300 वर्षों तक लगातार उसका संहार करें, तब भी उसका सर्वथा सफाया नहीं हो सकता है।

वह अपनी शक्तियां से राजाओं को जीतकर अपने पहाड़ी के किले में बंद कर लेता है। भगवन शंकर की उपासना से ही उसे ऐसी शक्ति प्राप्त हुई है।

जरासंध के बारे में सब बताकर, भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से यह कहा था कि जरासंध अभी तक 86 राजाओं को कैद कर चुका है। उसे 14 राजाओं को अभी और कैद करना बाकी है।

फिर वह सभी 100 राजाओं का एक साथ मर्दन करेगा। जो राजा जरासंध का वध करके उसके इस क्रूर कर्म को रोकेगा। वहीं राजा निश्चय ही सम्राट बनेगा।

इसलिए यदि आप राज्य करना चाहते हैं। तो सबसे पहले आपको जरासंध का वध करके उसकी कैद से राजाओं को मुक्त कराना होगा क्योंकि यह काम किए बिना आपका राजसूय यज्ञ नहीं हो सकेगा।

भगवान श्री कृष्ण की यह बात सुनकर युधिष्ठिर ने उनसे पूछा था कि भगवान आप ही बताइए कि उस दुष्ट जरासंध को कौन मार सकता है? यह बात सुनकर तब भीम सेन ने यह कहा था, कि भगवान श्रीकृष्ण में नीती है, मुझमें बल है, और अर्जुन में विजय पानी की योग्यता है।

इसलिए हम तीनों मिलकर ही जरासंध के वध का काम पूरा करेंगे। भीम की बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से यह कहा था, कि भीम सेन और अर्जुन मेरे नेत्र हैं, और आप मेरे मन है, इसलिए मैं चक्रवर्ती सम्राट होने के स्वार्थ में तुम तीनों को उस दुष्ट जरासंध से युद्ध करने के लिए नहीं भेज सकता हूँ, और मैं राज्य का विचार ही अपने मन से निकाल रहा हूँ। 

यह बात सुनकर तब अर्जुन ने उनसे यह कहा था, कि भाई जी मुझे तो क्षत्रीयों का बल और वीरता ही प्रशंसनीय जान पड़ती है।

यदि हम लोग राजसूय यज्ञ को निमित्त बनाकर, जरासंध का वध करके राजाओं की रक्षा कर सकें, तो हमारे लिए इससे बढ़कर क्या होगा? अर्जुन की आवाज़ सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन की प्रशंसा करते हुए, धर्मराज से कहा था, कि अब तक युद्ध से बचकर कोई भी प्राणी अमर नहीं हुआ है।

इसलिए वीर पुरुष का कर्तव्य है, कि वह नीती के अनुसार शत्रु पर चढ़ाई करें, और अपनी विजय की भरपूर चेष्टा करें। यदि वे असफल हुआ तो, यह लोक प्राप्त होगा, अन्यथा परलोक प्राप्त होगा। दोनों ही अवस्था में वीर पुरुष का कार्य सिद्ध होता है।

इस प्रकार जरासंघ राजसूय यज्ञ से जुडी बड़ी मुसीबत मेसे एक था। भगवन श्री कृष्ण की छत्र छाया में भीम ने मलयुद्ध कर,जरासंघ का वध किया और यज्ञ की बाधा के साथ 86 बंदी राजाओ को भी मुक्त किया था।
जय श्री कृष्णा।


राजसूय का अर्थ क्या होता है?

राजसूय यज्ञ एक वैदिक यज्ञ है जिसे राजा महाराजा अपने चक्रवती सम्राट बनने के लिए करते थे।


राजसूय यज्ञ क्यों किया जाता था?

राजसूय यज्ञ राजाओ में सबसे विशेष वर्चस्व, यानि सभी राजाओ में श्रेष्ठ राजा का स्थान प्राप्त करने के लिए किया जाता है। जिसमे दूसरे सारे राजाओ की सम्मति होती हे ,अगर कोई इसका विरोद्ध करता है तो उसे उस राजा से युद्ध करना होता है।

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